दुनिया की सबसे तेज ट्रेन कैसे काम करती है?

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दुनिया की सबसे तेज ट्रेन कैसे काम करती है?

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1 दुनिया की सबसे तेज ट्रेन कैसे काम करती है?

आज के इस आर्टिकल में हम आपको बताएँगे की दुनिया की सबसे तेज ट्रेन कैसे काम करती है? और इसके पीछे की साइंस क्या है ? क्यों ये ट्रेन इतनी तेज़ चलती है? आदि सवालों के जबाव देने का प्रयास करेंगे साथ ही हम आपको इससे इससे जुडी बहुत सी रोचक जानकारियाँ आपके साथ साझा करेंगे | तो चलिए जानते है इसके बारे विस्तार से सब कुछ |

मैग्नेटिकली लैविटेटेड ट्रेन

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आजकल मैग्नेटिकली लैविटेटेड ट्रेन का होना आम बात है हालांकि सेंट्रल जापान रेलवे कंपनी की मैग्लेव ट्रेन दूसरी ट्रेन की तुलना में काफी अनोखी और श्रेष्ठ हैं 600 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक की स्पीड से दौड़ते हुए इसने फास्टेस्ट ट्रेन का दर्जा हासिल किया है | यह ट्रेन सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट का उपयोग करती है इसलिए इसे एससी मैगलेव कहा जाता है | इस ट्रेन के एक बार एक्साइटिंग करंट से चार्ज होने पर इसके सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट उसके साथ हमेशा के लिए एक सर्कुलेटिंग डीसी करंट और मजबूत मैग्नेटिक फील्ड उत्पन्न करते हैं |

मैग्नेटिक लैविटेशन टेक्नोलॉजी

आइए सफलतापूर्वक टेस्ट की गई ट्रेन की इस टेक्नोलॉजी जिसके वर्ष 2027 तक दूसरी मैग्नेटिक लैविटेशन टेक्नोलॉजी से आगे निकलने का अनुमान है कि बारे में अधिक समझे यही टेक्नोलॉजी 2030 तक न्यूयॉर्क शहर को वॉशिंगटन डीसी से केवल 1 घंटे में जोड़ने के लिए तैयार है | मैग्नेटिकली लैविटेटेड को सफलतापूर्वक ऑपरेट करने के लिए हमें निम्नलिखित तीन उद्देश्यों को प्राप्त करना होगा –

  • गाइडेंस
  • लेविटेट
  • प्रोपेल

हालांकि इससे पहले कि हम इस बारे में विस्तार से जानें कि ऐसी मैगलेव ट्रेन इन उद्देश्यों को कैसे प्राप्त करती है आइये इस ट्रेन की सबसे खास बात के बारे में समझाएं |

सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट्स

लैविटेटिंग ट्रेंस के लिए अधिक शक्तिशाली इलेक्ट्रोमैग्नेट्स की आवश्यकता होती है जितने अधिक मजबूत मैगनेट होते हैं उतना ही अधिक लिफ्टिंग और प्रोफाइलिंग पोस्ट उनके पास होता है जिसके कारण वश ट्रेन की स्पीड काफी तेज होती है एक सामान्य इलेक्ट्रोमैग्नेट हीटिंग की समस्या के कारण करंट वैल्यू को एक निश्चित सीमा से आगे बढ़ाने में असमर्थ होता है सुपरकंडक्टिंग इलेक्ट्रोमैग्नेट में कंडक्टर का तापमान एक क्रिटिकल लिमिट से नीचे रखा जाता है इसके बाद मटीरियल अचानक जीरो रिसेशंस के साथ भारी मात्रा में करंट लो उत्पन्न करता है वह परिणाम ठीक वैसा ही होता है जैसा हम चाहते हैं दिलचस्प बात यह है कि आपको केवल एक बार सुपरकंडक्टिंग कॉइल को एक एक्साइटिंग करंट का उपयोग करके चार्ज करने की आवश्यकता होती है ताकि शॉर्ट सर्किट कॉइल्स हमेशा के लिए बिना किसी एनर्जी लॉस के एक सर्कुलेटेड डीसी करंट उत्पन्न कर सके सुपरकंडक्टिंग कॉल द्वारा सर्कुलेट किया गया करंट बहुत ज्यादा होता है |

एससी मैगलेव में 700 किलो एंपियर

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700 किलो एंपियर जोकि कन्वेंशनल हाउसहोल्ड कॉपर गेज वायर के वर्तमान मूल्य का लगभग 10000 गुना है सुपरकंडक्टिंग इलेक्ट्रोमैग्नेट स्पष्ट रूप से सबसे शक्तिशाली और कुशल इलेक्ट्रोमैग्नेट्स कॉइल्स को सुपरकंडक्टिंग स्टेज में रखना चुनौती है इसके लिए एक जहाज पर लिक्विड हीलियम रेफ्रिजरेशन सिस्टम का उपयोग किया जाता है ऐसी मैगलेव ट्रेन में सुपरकंडक्टर एक न्यू बयान टाइटेनियम एलॉय होता है जिसका क्रिटिकल टेंपरेचर 9.2 केल्विन होता है एलॉय के टेंपरेचर को सीमा से नीचे रखने के लिए 4.5 केल्विन के टेंपरेचर पर लिक्विड हीलियम को इसके चारों ओर सर्कुलेट किया जाता है कंडक्टर के ऊपर से गुजरने के बाद लिक्विड हिलियम इवेपरेट हो जाता है इसे शुरुआती स्टेज में वापस लाने के लिए हिलियम कंप्रेसर और रेफ्रिजरेशन यूनिट का उपयोग किया जाता है |

एससी मैगलेव रेफ्रिजरेशन यूनिट

रेफ्रिजरेशन मैकमोहन – रेफ्रिजरेशन साइकिल के सिद्धांत पर काम करता है | फिर भी क्रायोजेनिक डिपार्टमेंट का यह इंजीनियरिंग टास्क अभी समाप्त नहीं हुआ है सुपरकंडक्टर रेडिएशंस के रूप में बाहर से गर्मी को अब जॉब कर सकता है इस अब्सॉर्प्शन को होने से रोकने के लिए इसके चारों ओर एग्रेडेशन शील्ड जोड़ी जाती है |

एससी मैगलेव की शील्ड हीटिंग की समस्या

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हालांकि ट्रेन के संचालन के दौरान इस शील्ड में एडी करंट का बनना और हीटिंग की समस्या हो सकती है | इस हीटिंग को बेअसर करने के लिए रेडी सनशील्ड को भी कूलिंग की आवश्यकता होती है जो की यूनिट को लिक्विड नाइट्रोजन सप्लाई करके प्राप्त की जाती है कन्वेक्टीव हीट ट्रांसफर को रोकने के लिए रेडिएशन फील्ड के अंदर एक वेक्यूम रखा जाता है | करंट पोलैरिटी का विरोध करने वाले ऐसे चार सुपरकंडक्टर्स को एक यूनिट में अरेंज किया जाता है हालांकि ऐसी मैगलेव में इलेक्ट्रोमैग्नेट बिना बिजली की सप्लाई के काम करते हैं क्रायोजेनिक्स डिपार्टमेंट को भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है इस तरह की कई सारी यूनिट स्क्रीन की लंबाई के साथ दोनों तरफ जुड़ी होती है | जैसा कि कहां गया है पहला कार्य प्रोपल्शन है | ट्रेन को आगे बढ़ाना एक आसान काम है इस उद्देश्य के लिए हम सामान्य इलेक्ट्रोमैग्नेट की एक सीरीज का उपयोग करते हैं उन्हें प्रोपेलिंग कॉइल्स कहा जाता है |

प्रोपेलिंग कॉइल्स द्वारा ट्रेन पर बल

प्रोपेलिंग कॉइल्स को एक अल्टरनेटिफ तरीके से पावर सप्लाई किया जाता है | जैसा कि दिखाया गया है और इसे एक गाइड वे के अंदर रखा गया है इसके बाद हमें यह पता लगाने की जरूरत है कि ट्रेन की सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट पर कृपया लिंक्वायस कि स्पोर्ट्स का उत्पादन कर रहे हैं | कृपया ध्यान दें कि एक मैग्नेट द्वारा दूसरे पर लगने वाले फोर्स की दिशा को समझने के लिए आपको पसंद नियरेस्ट पोस्ट पर ध्यान देना होगा |

फोर्स का विश्लेषण

इस प्रकार प्रोपेलिंग कॉइल्स के कारण सुपरकंडक्टिंग कॉल्स पर लगने वाले फोर्स का विश्लेषण करते हैं | यदि आप इन सभी फोर्सेज का परिणाम लेते हैं तो नेट फाॅर्स आगे की दिशा में होगा इसलिए ट्रेन आगे बढ़ती है जैसे ही ट्रेन अगली मेन पोजीशन में पहुंचती है प्रोपेलिंग कॉइल्स को अल्टरनेटर पोलैरिटी पर स्विच करें| ताकि नेट फोर्स फिर से आगे की दिशा में हो बस इस स्विचिंग की फ्रीक्वेंसी को कंट्रोल करके आप ट्रेन की स्पीड को कंट्रोल कर सकते हैं

एस सी मैगलेव ट्रेन का लेविटेशन

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आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि एससी मैगलेव ट्रेन का लैविटेशन इन सिंपल 8 के आकार वाले कॉइल्स की मदद से प्राप्त किया जाता है | जिनमे कोई पावर्ड भी नहीं होते हैं गाइडवे में ऐसे आठ आकार वाले कई सारे कॉइल्स अरेंज किए होते हैं | लैविटेशन टेक्नोलॉजी को समझने के लिए हमें पहले सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट की एक जोड़ी की प्रकृति के बारे में कुछ सीखना चाहिए परिणाम स्वरुप एससी मैग्नेट्स की इस जोड़ी द्वारा उत्पन्न किया गया मैग्नेटिक एरिया एक लॉन्ग परमानेंट मैग्नेट के समान होते हैं |

इस जोड़ी को एक लंबे बार मैग्नेट से बदले तो क्या होगा ?

यदि एक बार मैग्नेट इन 8 फिगर शेप वाली कॉल्स के पैरलल चलता है तो क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि क्या होगा ?  फैराडे नियम के अनुसार अलग-अलग मैग्नेटिक फ्लक्स दोनों लूप्स पर ईएमएफ को अंत उपयोग करेगा | क्या ये ईएमएफ एक ही दिशा में है ? कृपया ध्यान दें कि यह एक मुड़ी हुई क्वायल है जब हम इसे खोलेंगे तभी हम सही दिशा को समझ पाएंगे यह स्पष्ट है कि इंड्यूस्ड ईएमएफ विपरीत दिशा में है जिसका मतलब यह है कि बाहर मैग्नेट के मूवमेंट के कारण स्क्वायर पर इंड्यूस्ड ईएमएफ जीरो है | और कोई भी करंट रूप से नहीं बहेगा संक्षेप में बार मैग्नेट के लूट के सेंटर के माध्यम से घूमने से लोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा अब उसी केस पर फिर से विचार करें|

सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट फाॅर्स

लेकिन जैसा कि दिखाया गया है | इस बार मैग्नेट लूप से थोड़ा सा ऑफसेट है | यह नीचे वाला लुक हाई स्ट्रैंथ के मैग्नेटिक फ्लक्स का सामना करता है जिसका अर्थ यह है कि नीचे के लूप पर इंड्यूस्ड ईएमएफ ऊपर के लूप की तुलना में अधिक होगा | इस उच्च स्ट्रेंथ का अर्थ यह भी है कि लूट के माध्यम से एक नेट करंट गुजरेगा | करंट का यह फ्लो ऊपर के लोग पर एक साउथ पोल और नीचे के लुक पर एक नॉर्थ पोल का निर्माण करता है यदि आप मैग्नेटिक पोल्स के बीच फाॅर्स के इंटरेक्शन का विश्लेषण करेंगे | तो यह स्पष्ट है कि रिजल्ट ऊपर की तरफ फोर्स सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट पर लगाया जाता है | यदि यह फोर्स ग्रेविटेशनल पुल से अधिक हो तो मैगनेट ऊपर की ओर मूव करेगा हां एक सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट का मूवमेंट 8 आकार की क्वायल के पहले और ऑफसेट होने पर लैविटेशन उत्पन्न होता है | जैसे जैसे मैग्नेटो पर जाता है ईएमएफ में वैल्यू स्वरूप में हो रहे करंट फ्लो के बीच का अंतर कम हो जाता है | जिसका अर्थ है के लूप पर भी फाॅर्स कम हो जाता है | अंत में जब अब ऊपर की तरफ की फाॅर्स ग्रेविटेशनल पुल के बराबर हो जाता है तब या तो मैग्नेट संतुलित हो जाते हैं या फिर ट्रेनें ने लैविटेशन प्राप्त कर लिया होता है |

एससी मैगलेव ट्रेन का लैविटेशन

जापानी इंजीनियर्स ने इस टेक्नोलॉजी का उपयोग करके 3.9 इंच का लैविटेशन हासिल किया है | स्पष्ट रूप से ट्रेन की स्पीड जितनी अधिक होगी लैविटेशन फाॅर्स उतना ही अधिक होगा जिसका अर्थ है कि जब ट्रेन रुकी हुई होती है तो वो लेविटेट नहीं कर सकती है | यही कारण है कि एससी मैगलेव ट्रेन शुरू होने और लो स्पीड ऑपरेशन के लिए सामान्य टायर्स का उपयोग करती है | बाद में जब ट्रेन एक क्रिटिकल स्पीड प्राप्त कर लेती है ( 150 किलोमीटर प्रति घंटा से ऊपर की गति ) तो टायर पीछे हट जाते हैं | क्योंकि उस समय इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स स्क्रीन को लैविटेटेड करने के लिए काफी मजबूत होता है|

एससी मैगलेव ट्रैन गाइडेंस

गाइडेंस का मतलब है कि ट्रेन हमेशा केंद्रित होनी चाहिए | इसे आसपास की दीवारों से टकराई बिना चलना चाहिए दूसरे शब्दों में इसे लेटरल स्टेबिलिटी प्राप्त करनी चाहिए ( इधर उधर नहीं भागनी चाहिए ) | जैसा कि हमने पहले दिखाया था जापानी इंजीनियरयस ने 8 आकार वाले कोइल को आपस में जोड़कर यह स्टेबिलिटी काफी आसानी से हासिल की  यदि ट्रेन केंद्र में है तो दाएं और बाएं कॉइल पर इंड्यूस्ड ईएमएफ बराबर होंगे और इंटरकनेक्टिंग क्वायल से कोई करंट फ्लो नहीं गुजरेगा |

एससी मैगलेव ट्रेन दाई या बाई ओर चली गयी तो क्या होगा ?

मान लीजिए कि ट्रेन थोड़ी दाई और चली गई है यह बदलाव दाएं और बाएं कोयल के बीच एक ईएमएफ अंतर का कारण बनेगा | जिसके परिणाम स्वरूप इंटरकनेक्ट इन कॉइल्स में करंट फ्लो होगा इंटरकनेक्टिंग कॉइल्स के माध्यम से होने वाला करंट फ्लो दोनों निचले लूप के करंट फ्लो और प्रत्येक लूप की पोल स्ट्रैंथ को बहुत ज्यादा प्रभावित करेगा |

ट्रेन पर लागू होने वाले फोर्सेस का विश्लेषण

आप चित्र में देख सकते हैं कि फोर्सेज कि वर्टिकर्ल कंपोनेंट समान रहते हैं | लेकिन बाई ओर की ओर से एक नेट हॉरिजॉन्टल कंपोनेंट प्रकट होता है | जो ट्रेन को वापस केंद्र में जाने के लिए मजबूर करता है | जैसे ही ट्रेन केंद्र के पास आती है इंटरकनेक्टिंग लूप में करंट कम हो जाता है और अंत में फोर्स का होरिजेंटल कॉम्पोनेंट गायब हो जाता है | ट्रेन को स्थिर करने का यह कितना आसान और शानदार तरीका है |

एससी मैगलेव ट्रेन का क्रायोजेनिक सिस्टम: आईसीएनआईआरपी की गाइडलाइंस

अब तक की चर्चा से आप समझ सकते हैं कि क्रायोजेनिक सिस्टम और अन्य इलेक्ट्रिक अप्लायंसेज के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है आप इतनी स्पीड वाली ट्रेन में इलेक्ट्रिसिटी कैसे ट्रांसफर कर सकते हैं सेंट्रल जापान रेलवे ने इस उद्देश्य के लिए इंडक्टिव पावर कलेक्शन नामक तकनीक का इस्तेमाल किया |  यहां इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन का उपयोग करते हुए ट्रेन के ग्राउंड कोइल से इलेक्ट्रिक पावर को पावर कलेक्शन कोइल तक बिना किसी मटीरियल कांटेक्ट की ट्रांसफर किया जाता है सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट की मजबूत मैग्नेटिक फील्ड से यात्रियों के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है इस अनचाहे प्रभाव से बचने के लिए रोलिंग स्टॉक और पैसेंजर बार केशन सुविधा पर मैग्नेटिक फील्ड का उपयोग किया जाता है इस प्रकार मैग्नेटिक फील्ड की ताकत को आईसीएनआईआरपी की गाइडलाइंस के नीचे बनाए रखा जाता है |

एससी मैग्लेव ट्रेन की टेस्टिंग राइड

एससी मैग्लेव ट्रेन की टेस्टिंग राइड 1997 में यामानाशी मैगलेव टेस्ट लाइन पर शुरू हुई | टेस्ट ड्राइव काफी सफल रही और अगले 10 वर्षों तक एक भी दिन बिना रुके लगातार जारी रही इस दौरान 603 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड का वर्ल्ड रिकॉर्ड हासिल किया गया | इन्हीं एक्स्ट्रा पॉजिटिव परिणामों ने जैपनीस अधिकारियों को प्रोत्साहित किया और उन्होंने वर्ष 2027 तक तो क्यों और नागोया के बीच कमर्शियल इससी मैगलेव ऑपरेशंस करने की अनुमति दी | इसके बाद और अधिक एस सी मैगलेव ट्रेन जाने की उम्मीद है |

आशा है की आपको ये आर्टिकल पसंद आया होगा | इसे अपने दोस्तों के साथ साझा जरूर करे जिससे उनको भी फायदा पहुंचे |  यदि आपके मन में कोई भी सवाल हो तो आप  कमेंट बॉक्स में पूछ अपने सवाल सकते है | हम आपको जल्दी उत्तर देने का प्रयास करेंगे |

धन्यवाद |

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